घरो में बंद रहने की यादों को सहेजकर रखियेगा।
कभी वक़्त सदैव एक जैसा नही रहता। कितना ही अँधेरा हो हर गहरे अंधेरे की सुबह होती हैं। कभी बरसात की रात या बदल होने सूर्य कुछ समय ज्यादा देर से दिखता हैं लेकिंन सूर्य निकलता जरूर हैं।
ठीक वैसे ही धीरे धीरे कोरोना नामक वक़्त या यों कहें कि बुरा वक्त निकल जायेगा। कोरोना माहमारी की औकात मानव के सामने जब थक जाएगी। जब कोरोना माहमारी का इलाज संभव हो जाएगा। तब लॉकडाउन और कर्फ्यू खुल जाएंगे। हम लोग एक वृक्ष पर जिस प्रकार रात गुजारने वाले पक्षी एक पेड़ पर प्रत्येक रात्रि को आते हैं और भोर की पहली किरण के साथ फिर उड़ जाते हैं। अपने दाना पानी के लिए निकल जाते हैं।
ठीक वैसे ही जब कोरोना माहमारी से मुक्ति मिल जाएगी तब फिर हम उसी वृक्ष की तरह अपने अपने घरो को छोड़कर निकल पड़ेंगे अपने अपने कामो पर जिससे अपनी अपनी जरूरते पूरी हो सके लंबे समय बाद एक बार फिर वही बाजार,मॉल, दुकाने,जिम या बस डिपो,रेलवे स्टेशन हवाई अड्डा या वो सभी जिनसे हमारा तलूक हैं और जो हमारे लिए आवश्यक हैं। सभी वाला गली से गुजरेगा,दूध या अन्य जरूरत वाले सभी आवाजे देंगे लेकिन अब इनका महत्व जितना लॉकडाउन में था उतना नही। इनकी आवाजे लॉक डाउन में तो अमृत जैसी लगती थी। जिस गली में दूध वाला सब्जी वाला या अन्य कोई गुजरता वो गली वाला अपने आप को धन्य मानता था। लेकिन जैसे ही सबकुछ सामान्य हुआ अब वही ठेलेवालों की आवाज अब दोपहर में डिस्टर्ब करने लेगी। अपने मन से मोल भाव होने लगा। नही तो लॉक डाउन में तो सिर्फ इतना ही कहते थे जल्दी से दे दो ये लो रुपये।
लेकिन कभी आपने सोचा कि सदियों से भागती इस दुनिया मे एक ऐसा विश्राम आया कि हर कोई अपने अपने कार्यो को छोडकर घरो में कैद हो गया। सबकुछ थम गया। शहर और देश मेट्रो हो या हवाई जहाज या रेल या मानव जीवन कि तमाम व्यवस्थाये सब कुछ रुक गयी।
जिन पर हम फितरते कस्ते थे या जिनको हम हल्के में लेते थे या जिनको सिर्फ गंदगी उठाने वाला मानते थे वो इस मुश्किल घड़ी में फरिस्ते बन गए। पुलिस डॉक्टर्स और सफाईकर्मियों ने अपना कार्य उम्दा और जीवन भर यादगार बना दिया। हमारे जीवन में न तो ऐसी माहमारी या बीमारी आयी न ही आएगी। लेकिन जिनलोगों ने इस मुश्किल घड़ी में देश की जनता के लिए जो कर रहे हैं वो याद किया जाएगा।
लेकिन जब समय अच्छा आ जाए तो जिस ने हमे मुश्किल घड़ी में संभाल कर अपनी बाहों में रखा उस जगह अर्थात घर भले वो उस समय किराये का ही क्यो न हो को नमन। इसलिए किसी ने सही हैं हैं घर बिन धर कहा। मुश्किल घड़ी में सिर्फ घर अपने लोग। फालतू में सभी घरों से जल्दी अपने दोस्तों और ऑनलाइन फ्रेंड्स से चैटिंग के लिए उतावले भागते थे लेकिन आखिर बुरे समय मे साथ दिया घर और अपनों ने यही सच हैं। इसलिए जिंदगी में कभी इनको मत भूलना न ही इनसे दूरी बनाना। क्योकि बुरे वक़्त में जो साथ रहे वही अपना बाकी सब पराये।
इस माहमारी मे आप घरो में रहे अपनो के बीच रहे क्या किया,कैसे गुजरा लॉक डाउन,क्या खाया,कैसे सोये,कितने खेले,कितनी लड़ाई की,कितना अपनो के बीच बैठ कर समय व्यतीत किया। जिस माँ की शिकवा था कि बेटा और बेटी घर पर तो रहते ही नही,जिस पत्नी को शिकायत थी कि महाशय कभी समय पर घर नही आते,कही सौतन तो नही उनकी शिकायत दूर। जो रोज कहते थे कि कंपनी के काम से कभी आराम नही मिला,जो कहते थे कि रोज रोज कर्मचारियो से मिलकर उनको समझा समझा कर तंग आ गया हूँ। या ऐसे सभी जो इस मुश्किल दौरे में घरो में रह रहे हो उनको लॉक डाउन के बाद भी अपनी इस समय की यादों को सहेजकर रखना जरूरी हैं क्योकि जब भी हम इस समय को याद करेंगे तो घर मे बिताए ये अमूल्य क्षण याद रहेंगे।
सदियों से सब को एक साथ मिल बैठकर खाना खाने व मस्ती करने का जो समय मिला वो हकीकत में अमूल्य समय ही हैं।
अभी अपनी आस्था को ऊपरवाले पर डाल दो और इस दौर के गुजर जाने का इंतजार करो।
अब कुछ कहेंगे कि मंदिर बन्द हैं,मस्जिद या चर्च और गुरुद्वारे बंद हैं पूजा कैसे करे या उनकी दुवा कैसे ले तो।
तो दोस्तो एक बात याद करो कि वैसे भी कण कण में ऊपर वाला हैं। जब भी हम सुनसान रास्ते मे होते हैं जहाँ हम भय से ग्रसित हो जाते है और जैसे ही अपने अपने ईस्ट को याद करते हैं हमारा हौसला बढ़ जाता हैं और भय भाग जाता हैं तब हम यवः क्यो नही सोचते कि उस समय अपने मंदिर या मस्जिद या गिरजा या गुरद्वारे में उस समय आप नही थे फिर आपकी रक्षा कैसे हुई। उत्तर साफ हैं। कण कण में आपका ईस्ट हैं।
जिसका उद्धरण हैं जब प्रह्लाद को कंश ने खंबे से बंधा तो उसने जिस रूप में याद किया तो नृसिंम खम्बा फाड़कर प्रगट हुए। मतलब यह सच हैं कि कण कण में हमारा आराध्य हैं।
इसलिए लॉक डाउन के इस समय मे घरो से न निकालकर घरो से ही अपने ईस्ट आराध्य को याद करे आपको कण कण में आपका आराध्य मिलेगा।
चलिए आपको अगर यह लेख पसंद आया हो या अन्य किसी विषय पर लेख चाहते हैं तो कमेंट में जरूर लिखे।
ठीक वैसे ही धीरे धीरे कोरोना नामक वक़्त या यों कहें कि बुरा वक्त निकल जायेगा। कोरोना माहमारी की औकात मानव के सामने जब थक जाएगी। जब कोरोना माहमारी का इलाज संभव हो जाएगा। तब लॉकडाउन और कर्फ्यू खुल जाएंगे। हम लोग एक वृक्ष पर जिस प्रकार रात गुजारने वाले पक्षी एक पेड़ पर प्रत्येक रात्रि को आते हैं और भोर की पहली किरण के साथ फिर उड़ जाते हैं। अपने दाना पानी के लिए निकल जाते हैं।
ठीक वैसे ही जब कोरोना माहमारी से मुक्ति मिल जाएगी तब फिर हम उसी वृक्ष की तरह अपने अपने घरो को छोड़कर निकल पड़ेंगे अपने अपने कामो पर जिससे अपनी अपनी जरूरते पूरी हो सके लंबे समय बाद एक बार फिर वही बाजार,मॉल, दुकाने,जिम या बस डिपो,रेलवे स्टेशन हवाई अड्डा या वो सभी जिनसे हमारा तलूक हैं और जो हमारे लिए आवश्यक हैं। सभी वाला गली से गुजरेगा,दूध या अन्य जरूरत वाले सभी आवाजे देंगे लेकिन अब इनका महत्व जितना लॉकडाउन में था उतना नही। इनकी आवाजे लॉक डाउन में तो अमृत जैसी लगती थी। जिस गली में दूध वाला सब्जी वाला या अन्य कोई गुजरता वो गली वाला अपने आप को धन्य मानता था। लेकिन जैसे ही सबकुछ सामान्य हुआ अब वही ठेलेवालों की आवाज अब दोपहर में डिस्टर्ब करने लेगी। अपने मन से मोल भाव होने लगा। नही तो लॉक डाउन में तो सिर्फ इतना ही कहते थे जल्दी से दे दो ये लो रुपये।
लेकिन कभी आपने सोचा कि सदियों से भागती इस दुनिया मे एक ऐसा विश्राम आया कि हर कोई अपने अपने कार्यो को छोडकर घरो में कैद हो गया। सबकुछ थम गया। शहर और देश मेट्रो हो या हवाई जहाज या रेल या मानव जीवन कि तमाम व्यवस्थाये सब कुछ रुक गयी।
जिन पर हम फितरते कस्ते थे या जिनको हम हल्के में लेते थे या जिनको सिर्फ गंदगी उठाने वाला मानते थे वो इस मुश्किल घड़ी में फरिस्ते बन गए। पुलिस डॉक्टर्स और सफाईकर्मियों ने अपना कार्य उम्दा और जीवन भर यादगार बना दिया। हमारे जीवन में न तो ऐसी माहमारी या बीमारी आयी न ही आएगी। लेकिन जिनलोगों ने इस मुश्किल घड़ी में देश की जनता के लिए जो कर रहे हैं वो याद किया जाएगा।
लेकिन जब समय अच्छा आ जाए तो जिस ने हमे मुश्किल घड़ी में संभाल कर अपनी बाहों में रखा उस जगह अर्थात घर भले वो उस समय किराये का ही क्यो न हो को नमन। इसलिए किसी ने सही हैं हैं घर बिन धर कहा। मुश्किल घड़ी में सिर्फ घर अपने लोग। फालतू में सभी घरों से जल्दी अपने दोस्तों और ऑनलाइन फ्रेंड्स से चैटिंग के लिए उतावले भागते थे लेकिन आखिर बुरे समय मे साथ दिया घर और अपनों ने यही सच हैं। इसलिए जिंदगी में कभी इनको मत भूलना न ही इनसे दूरी बनाना। क्योकि बुरे वक़्त में जो साथ रहे वही अपना बाकी सब पराये।
इस माहमारी मे आप घरो में रहे अपनो के बीच रहे क्या किया,कैसे गुजरा लॉक डाउन,क्या खाया,कैसे सोये,कितने खेले,कितनी लड़ाई की,कितना अपनो के बीच बैठ कर समय व्यतीत किया। जिस माँ की शिकवा था कि बेटा और बेटी घर पर तो रहते ही नही,जिस पत्नी को शिकायत थी कि महाशय कभी समय पर घर नही आते,कही सौतन तो नही उनकी शिकायत दूर। जो रोज कहते थे कि कंपनी के काम से कभी आराम नही मिला,जो कहते थे कि रोज रोज कर्मचारियो से मिलकर उनको समझा समझा कर तंग आ गया हूँ। या ऐसे सभी जो इस मुश्किल दौरे में घरो में रह रहे हो उनको लॉक डाउन के बाद भी अपनी इस समय की यादों को सहेजकर रखना जरूरी हैं क्योकि जब भी हम इस समय को याद करेंगे तो घर मे बिताए ये अमूल्य क्षण याद रहेंगे।
सदियों से सब को एक साथ मिल बैठकर खाना खाने व मस्ती करने का जो समय मिला वो हकीकत में अमूल्य समय ही हैं।
अभी अपनी आस्था को ऊपरवाले पर डाल दो और इस दौर के गुजर जाने का इंतजार करो।
अब कुछ कहेंगे कि मंदिर बन्द हैं,मस्जिद या चर्च और गुरुद्वारे बंद हैं पूजा कैसे करे या उनकी दुवा कैसे ले तो।
तो दोस्तो एक बात याद करो कि वैसे भी कण कण में ऊपर वाला हैं। जब भी हम सुनसान रास्ते मे होते हैं जहाँ हम भय से ग्रसित हो जाते है और जैसे ही अपने अपने ईस्ट को याद करते हैं हमारा हौसला बढ़ जाता हैं और भय भाग जाता हैं तब हम यवः क्यो नही सोचते कि उस समय अपने मंदिर या मस्जिद या गिरजा या गुरद्वारे में उस समय आप नही थे फिर आपकी रक्षा कैसे हुई। उत्तर साफ हैं। कण कण में आपका ईस्ट हैं।
जिसका उद्धरण हैं जब प्रह्लाद को कंश ने खंबे से बंधा तो उसने जिस रूप में याद किया तो नृसिंम खम्बा फाड़कर प्रगट हुए। मतलब यह सच हैं कि कण कण में हमारा आराध्य हैं।
इसलिए लॉक डाउन के इस समय मे घरो से न निकालकर घरो से ही अपने ईस्ट आराध्य को याद करे आपको कण कण में आपका आराध्य मिलेगा।
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